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मदन बनाम हमारा गीत सदन

Posted On: 5 Jul, 2017 में

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मदन बनाम हमारा गीत सदन

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एक सौ दस किलो का मदन मेरा दोस्त है | छठवी जमात से इसके साथ संग में मैं हूँ | 1952 की पैदाईश, क़स्बा आमला, जिला बैतूल, मध्य प्रदेश | याई (माँ) लक्ष्मी देवी गुगनानी तथा लाला (पिताजी) रामनरायन गुगनानी जी के चश्मों चिराग | यह कुनबा पाकिस्तान के सिंध इलाके से बंटवारे के वक़्त यहाँ आया और बस गया | लाला की सूटिंग शर्टिंग की जमी जमाई शानदार दूकान का आज यह जिम्मेदार मालिक है | वह दूकान इसी के काम नहीं आ रही है, हम दोस्तों के काम भी आती रही है | मुझे गर्व है कि मदन की अगुआई में जिन्दगी की पहली चोरी इसी दूकान में करने का परम सौभाग्य राजा मालवीय के साथ साथ  मुझे भी प्राप्त हुआ है | दिन दहाड़े यह महान चोरी राजा के इनडोर अखाड़े में रियाज़ के लिए दोस्तों के लंगोट हेतु संपन्न हुई थी | ये पांच पहलवान थे – थन्नीलाल उस्ताद, राजा मालवीय मालिक- ए-अखाड़ा, बब्बू पहलवान उस्ताद-ए-मालिश, इस आलेख के हीरो — हैवी वेट सूमो मदन लाल गुगनानी और यह नाचीज़ लक्ष्मीकान्त वर्जिश-ए-गुलफाम, इस आलेख का लेखक | उस महान दूकान के दरिया में मैंने अपनी कई नामाकूल उधारियों को ऐसा डुबोया है कि दुबारा कभी सतह पर नहीं आ पाई | शुक्रिया मेरी प्यारी दूकान | खैर |

चलिए लेख शुरू ———

कवि व “आप” पार्टी के चर्चित चेहरे कुमार विश्वास ने एक बात कही जो मन को भा गयी |

“उर्दू और हिन्दी में फर्क इतना

वो देखें ख्वाब और हम सपना “

मदन वह मोशाय है जब भावुकता में सिहरता है तो उसके शरीर पर ऊगे हुए कोमल दूब से रोम यकायक तन जाते हैं और आँखें खारे पानी का समंदर बन जाती है | यह उसकी काबिलियत है कि यदि गीत ग़ज़ल में सही जगह पर सजा हुआ लफ्ज़ “ख्वाब” आये या शब्द “सपना”, वह जितना “ख्वाब”का शैदाई है, “सपना”शब्द पर भी उतनी ही जान छिड़कता है | हम बचपन के चार यारों में अकेला बंदा है जिसकी ‘खडी बोली’ या ‘जन भाषा हिन्दी’ पर शानदार गिरफ्त है | हम बाकी लोग मध्य प्रदेश शासन की पाठ्य पुस्तकों की हिन्दी के दायरे के बंधे बंधाये सिखिया हैं, जिन्हें निराला बच्चन तक का थोडा पता है, प्रदीप, हसरत, कैफ़ी, शकील और शैलेन्द्र के बारे में उतना ही मालूम जितना मदन ने बतलाया है |

कहना यह है कि उर्दू और हिन्दी की समझ उसके डी एन ए में है | वह सिन्धु घाटी की सभ्यता का उत्पाद है | यह मोहन जोदड़ो, हड़प्पा वाली आर्यकालीन रवायत तथा तहजीब, सिंध में जन्मे ‘याई (माँ)’ लक्ष्मी देवी गुगनानी और ‘लाला (पिताजी) रामनारायन गुगनानी जी’ से उस तक पहुँची है | मुझे बहुत अच्छे से याद है जब ‘याई’ फिल्मों पर बात करती थी तो हम लोगों के अन्दर चकमक की आपसी रगड़ वाली चिंगारियां छूटती थी, और हम फिल्म देखने की तमीज सीखते थे |

हैरत वाली बात यह है कि जो अपने वज़न के कारण ठीक से चल भी नहीं पाता, वह गीत ग़ज़लों की तरफ पूरा का पूरा 180 डिग्री से 001 डिग्री तक झुक गया ? बाक़माल लचीलापन | जवाब सीधा है – पैतृक संस्कारी विरासत और उसकी अपनी सुरों के लिए दीवानगी |

उसने अपने बावलेपन को जिल्द में लपेट रखा है | पहला बोलता सिनेमा “आलमआरा” से गानों की फेहरिस्त शुरू होती है | जानकारी का आलम यह है कि “गूगल” फेल हो जाए | संगीतकार, शायर तक तो ठीक है पर आप डायरेक्टर और किरदारों के साथ साथ उस फिल्मोखास से ताल्लुक रखता कोई वाकया या वारदात भी अगरचे है तो भाई के मुंह से सुन लीजिये |

आप हम सभी जानते हैं कि हमारी साठ प्लस वाली जेनरेशन ने स्व-नामधन्य गायकी के सरताज कुंदन लाल सहगल को रेडियो सीलोन से ही जाना है | “इक बंगला बने न्यारा” जेहन में अभी भी गूंजता है | लेकिन वाकया कुछ ऐसा है कि जनाब की दूकान पर बैठे ठाले— याद नहीं जिक्र क्या था ? मद्दी ने !! जी हाँ भाई साहब, मद्दी इज अ निक-नेम ऑफ मदन | तो मद्दी ने अन्दर कहीं से लाकर एक बॉक्स फाईल मेरे सीने पर ला पटकी | उसमें जिस अखबार की जमाखोरी थी, उसका नाम है- लिस्नर्स बुलेटिन | अनुवाद / तर्जुमा करे तो होगा-श्रोताओं के लिए अधिकृत विज्ञप्ति या पत्रक, था वो श्रोताओं के लिए फ़िल्मी न्यूज़ का बुलेटिन | उसमें मद्दी ने परिचय करवाया “मास्टर मदन” से | एक पुरातात्विक स्वर | महान गायक – मास्टर मदन (28-12-1927 से 05-06-1942), जिन्होंने तीन साल की उम्र से चौदह साल चार महीनों की उम्र तक ही अपनी आवाज़ से मौसिकी को निहाल किया | बानगी के लिए नग़मा, “यूं न रह रह कर हमें तरसाईये” ग़ज़लकार हैं सागर निज़ामी | तो ऐसा है मेरे मोटे यार का कलेक्शन |

साहब, मास्टर मदन तो बेशक हम सबकी श्रद्धा के पात्र हैं पर मेरा जिगरी “हेड मास्टर मदन”भी निरा, निपट ; मेरे नतमस्तक होने का हक़दार है | आप देखें, उर्दू की लिखावट दाहिने से बाएं चलती है और हिन्दी की बाएं से दाहिने | चलते चलते जहां एक दूसरे के आमने सामने पहुंचकर आपस में लिपटकर गले मिलती हैं, उसी जगह पर भाई मदन का भाषायी मुकाम है |

संगीत में ताल और धुन की बड़ी गहरी समझ रखते हैं ये ज़नाब | इनको संगीत की कोई अकेडमिक तालीम नहीं मिली हुई है पर इनके अपने शौक ने इनके रुझान को तफसील (विस्तार) और संजीदगी (गंभीरता) दी है | लय तथा ताल की शास्त्रीय खासियत के मद्दे नज़र कहें तो यह मद्दी (मदन) खुद शास्त्रीय राग “कल्याण” है, इस राग को मुग़लकाल के बाद से ‘यमन’ या ‘इमन’ भी कहते हैं | ‘यमन’ में जाने पहचाने नगमें हैं – “मन रे तू काहे ना धीर धरे…”(चित्रलेखा), “चन्दन सा बदन चंचल…” (सरस्वतीचन्द्र), “जब दीप जले आना..” (चितचोर), “घर से निकलते ही ..” और भी कई गाने | मालकौंस (रागों का राजा) में ‘रे’वर्जित है | भैरवी (रागों की मल्लिका) में शुद्ध ‘रे’,’ग’,’ध’,’नि’ वर्जित है | लेकिन यमन में किसी सुर की मनाही नहीं है; हाँ, ‘म’ तीव्र का चाहिए | “यमन” और “मदन” दोनों मेरे लिए आवारा ‘राजकुमार’ है | पूर्णिमा की रात में समंदर के ज्वार भाटों में जो तीव्रता होती है, वो ही यमन के ‘म’ में है और बिलकुल वो ही मदन की तन्मयता में है जब वह गीत में अस्त होता है | यह सच है, मदन गीत में डूबता नहीं अस्त होता है और ऊगता है; किसी चाँद सितारे या सूरज की तरह |

गीत में रागदारी तथा रूहदारी को मदन कान से नहीं आत्मा से महसूस करता है | कोई गीत हमारे लिए फिजां में गूंजने के बाद ख़त्म हो जाता है | मदन के लिए नहीं | गीत की अमरता से सच्चे मायनों में वह वाकिफ है | उसे गीत से ताल्लुकात रखती हर बात पसंद है | स्वर कोकिला, सुर साम्राज्ञी, साक्षात सरस्वती, भारत रत्न, पूज्य लता मंगेशकर के लीविंग रूम में लिट्रली उनके चरणों में बैठे मदन की उस मुलाक़ात की कल्पना मुझे रोमांचित कर देती है कि यह लता दीदी को देख रहा था या यह दीदी की देह में गीत और नगमों की परवरिश तथा रिहाईश को देख रहा था | इस पट्ठे ने दीदी से यहाँ आमला घर में भाभी और विधि (बेटी) से फोन पर बात भी करवाई | यह बंदा खुशी बांटता भी है |

एक होली की दोपहर में मेरा बदन रंगदार पानी से और मन अल्कोहल से भीगा हुआ था, इसने अपने वोईस प्लेयर के सामने मुझे बिठाकर एवर ग्रेट नुसरत अली फ़तेह अली की गायकी से मिलवा दिया | ओफ्फोह ! उस दिन से भाई मैं निजी तौर पर उनका मुरीद हो गया |

अब लेख लिखने की वजह भी आम कर देता हूं | दरअसल, आठवीं कक्षा में इसके ढाई किलो से यकीनन ज्यादा वजनी दाहिने हाथ पर हुए पके बदबदाये फोड़े में मैंने अपने सहपाठी सूरज के कम्पास बॉक्स से डीवाईडर (दो नोक वाला) निकाल कर घुसेड दिया था | बाकी कल्पना आप कीजिये | मेरी उपलब्धि यह है कि मुझे अपने क्लास टीचर से पीठ पर शाबासी और याई से घर में रूह अफ़ज़ा के शरबत का गिलास मिला था | सच में मदन को छोड़कर कोई भी नाराज़ नहीं था | उसके उस दर्द की टीस और कसक पर यह लेख मसाज़ की दोस्ताना कोशिश है |

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