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गोपनीय गलती

Posted On: 19 Jun, 2017 में

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मेरी इस ग़ज़ल से मैं ही खुश हो गया | हरेक पिछले शेर से एक शब्द लेकर उसे अगले शेर में लाकर नए सन्दर्भ का शब्द चित्र बनाया है | गजल में कम से कम ऐसा प्रयोग मेरी आँखों के सामने से नहीं गुजरा, इसे नया समझकर भी मैं खुश हूँ,यदि ऐसा हुआ भी है तो मैं नाखुश नहीं होऊंगा क्यों कि मैं भी ऐसा कर सका हूँ |

(1) से (5) तक जीवन के तनाव है, मन की बेचैनी, मायूसी, निर्मम सच्चाई, है | (6) और (7) में मेरा अपना मिज़ाज, स्वभाव है | (6) और (7) में जो बंजारन है,वह मेरे चाहने वाले छोटे, बड़े और हमउम्र लोगों के व्यवहारों की स्मृतियाँ तथा प्रेरणाएं हैं, जिनके साथ मैं यात्रा पर हूँ |

“गोपनीय गलती”
************

सच्ची बात भली हो तो भी सबको कहाँ सुहाती है |
गोपनीय गलती* से सीधे जा जा कर टकराती है |(1)

*गलती सहसा नहीं होती पीछे कारण आते हैं,
हर गलती के आगे आगे एक कथा* बन जाती है |(2)

सबके अपने अपने किस्से किरदारों के अनुभव हैं,
कई *कथा के चर्चे* होते कुछ यूं ही मर जाती है |(3)

*चर्चे सदा न दिल बहलाते फंदे बन दहलाते हैं,
इन फंदों* को सुलझाने में साँसें कम रह जाती है |(4)

कुछ बाहें *फंदें बन जाती कुछ गले में हार बनेगी,
फंदे बाहों की अनबन में साँसे थमथम* जाती है |(5)

धूप सरीखा रूप *थाम कर बस्ती के अंधियारे में,
मस्त बंजारन* छवि तुम्हारी इधर उधर मंडराती है |(6)

‘सुशीरंग’ इक बंजारा है तुम भी इक *बंजारन हो,
बंजारों का सफ़र (रे) दुनिया उंगली रोज उठाती है |(7)

सच्ची बात भली हो तो भी सबको कहाँ सुहाती है |
गोपनीय गलती से सीधे जा जा कर टकराती है |
*******************************************१८/०६/२०१७

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