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देह दिल और अदा

Posted On: 16 Mar, 2017 में

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देह दिल और अदा
देह यानि दृश्य, स्वाद, गंध, ध्वनि, और छुअन के साथ रहना |नींद से मिली तनावहीनता में भी और जागरण से जुड़ी सक्रियता में भी | माँ के भीतर गर्भनाल के सहारे तिरते हुए मिले अनूठे अनुभव जो ताउम्र सुखभोग के पैमानों का काम करते हैं | बेमिसाल आराम का प्रबंध | बंधु, देह के ग्रहण-बोध पर ग्रहण मत लगने देना – शरीर नरक का दरवाजा नहीं है |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि व्दिषो जहि || अर्गलास्तोत्रम्-श्री दुर्गासप्तशती ||
(हे आदि चेतना , रूप दो, जय दो, यश दो, भीतरी शत्रुओं का नाश हो)

रूप दो, किसे ? काया को | यदि भीतरी रूप की बात है तो भी शरीर के पुल से ही जाना होगा, वैसे यहाँ यह जिस्म और जान दोनों के लिए माँगा गया आशीर्वाद है | पुष्प के रूप में पराग केशिकाओं से लेकर पंखुरियां और डंठल तक भीतरी बाहरी सब शामिल है | पुष्प का रूप पूरे खिलने में है, देह का रूप भी पूरे खिलने में है | खिलना मानी खुलना | पूरा खुलना ,समूचा खुलना, आर-पार खुलना, ओर-छोर, गिरह-गाँठ, कस-बल सभी का खुलना | तन की उपस्थिति उद्गम है, इन्द्रीय संग सोच का और इन्द्रीय परे सोच का |
देह आवश्यक शर्त है इन्द्रीयजन्य एवं इन्द्रियातीत अनुभवों की | रूपं देहि- रूप के वरदान की अभिलाषा है |इस अभिलाषा के पूरा होने पर मेरी मात्र उपस्थिति सभी को सुहाएगी |मेरी उपस्थिति की प्रतिक्षा होगी | रूप में देह के साथ है दिल | देह को मिले रूप पर दिल की पहरेदारी है |

जय दो, क्या है जय ? पराजित करने पर अपने कुटिल भाव का परितोष, परपीड़ा से तुष्टि | विपक्ष में उसके अपने लक्ष्यों से प्रतिबद्ध वीर योद्धा की मौत हमारे लिए क्या वास्तव में हमारा सम्मान है ? क्या प्रतिद्वंदी की देह का विलय ही हमारी जय है ? यथार्थ में जय समरांगन की गर्जना नहीं पूजा की लयकारी है | जय किसी के अमंगल की कामना नहीं है | मेरी माँ की जय तेरे माँ की पराजय पर निर्भर नहीं है | जय का आशय यहाँ सफलता है | जय दो यानी प्रयत्न को परिणाम तक पहुँचने का वरदान दो | कर्म की कृति में संभावना को विश्वसनीय यथार्थ में बदलना जय है | काया से परे स्वत: की सम्पूर्ण, अशेष अभिव्यक्ति के लिए किसी नकार के लिए कोई जगह न छोड़ना जय है | जय के अस्तित्व के लिए किसी पराजय या किसी के परास्त होने की घटना जरूरी नहीं होती | जय, परिचय-पहचान को आदर और मान्यता है | जय में दिल के साथ देह है | दिल को मिली जय पर देह की पहरेदारी है |

यश दो, क्या है यश ? किसे मिले यश ? उदाहरण हो जाना यश है | उपमेय से उपमान हो जाना यशस्वी होना है (उपमेय जिसकी तुलना हो,उपमान जिससे तुलना हो )|यश जड़ छवि नहीं है, सतत विस्तार है, श्रेय पर मुहर है | यह प्रभाव के दायरे को बढाने का खुद का नियोजित प्रयास नहीं है | यह दूसरों के द्वारा सहृदयता पूर्वक की गयी पुष्टि है कि तुम्हारे कर्म और कृति से किसी का अहित नहीं हुआ है, हमें प्रेरणा मिल रही है कि हम भी कदम बढ़ा सकते हैं |तो किसे मिले यश, निश्चित तौर पर उसे,जिसने चुनौतियों और कठिनाईयों को जिम्मेदारी से निपटाया हो | जिम्मेदारी के इस भाव के आसपास ही यश पनपता है |स्वयम के प्रति जिम्मेदारी अपनी क्रिया को कर्म ,कर्म से कृति फिर कृति से कौशल तक पहुंचाती है | औरों के प्रति जिम्मेदारी अपनी क्रिया को कर्म ,कर्म से कृति फिर कृति से कीर्ति तक पहुंचाती है |

इन तीन इच्छाओं की सिद्धि आदिम महत्वाकांक्षा है | पूरी ग्लोबल जनसंख्या में हरेक में ये तीन मनोरथ होते ही हैं, शायद कुछ वैरागी होते भी हों, पर दुर्भाग्यवश मेरा वास्ता नहीं पड़ा किसी ऐसे विलक्षण पुरुष स्त्री से | रूप, जय, और यश पर और मुखर होऊँ और साऊंड करूँ, इसके पहले एक रिक्वेस्ट है कि मेरी लेखन शैली से मुझे पुरानी या नई , सनातनी या मॉडर्न, पिछड़ी या अगड़ी किसी विचारधारा से मत जोड़ियेगा | असल में “विचार” की प्रक्रिया की मेरी समझ ऐसी है कि, चीजें बदलती हैं, बदलाव की गति से समय का भान(अवेयर) और भास् (रियलाईज)होता है, इस भान से भास के बीच मन का बेसब्रापन जो कर डालता है, वह विचार है | यह भान के पीछे सटकर शुरू और भास के पीछे सटकर ख़त्म होता है |

रूप, जय, यश ये तीनों विचार हैं | ये विचार पूर्वी तथा पश्चिमी, धरती के दोनों हिस्सों में हैं | दोनों ओर आज भी इनकी प्रासंगिकता कायम है |
नीचे की उक्ति में प्रकट विचार भी मानवीय मननशीलता की निधि में मानव जीवन के मूल्य के बराबर की कीमती धरोहर है-
“Government of the people , by the people, for the people , shall not perish from the Earth ”
–अब्राहम लिंकन
(लोगों के लिए, लोगों के द्वारा , लोगों की सरकार ,धरती से मिट न जाये/तबाह न हो जाये )
रूप जय यश और लोगों की सरकार में आपसी नाता क्या है? सो सिंपल ,असल में लोगों की सरकार में लोगों की मंशाएं , लोगों के प्रयोजन निहित होते हैं | बहुत सीधी व स्पष्ट बात है , जनता के रूप, जय, एवं यश में संवृद्धि बनाम ग्रोथ |
यह समझाने की जरूरत नहीं है कि खाना, तालीम और सेहत “रूप” का अभिन्न हिस्सा है, “जय” बनाम सफलता के लिए सुयोगों को सुनिश्चित करना सरकार का प्राथमिक दायित्व है, सरकार की तटस्थता “यश” को स्पेस देती है |
देह, दिल और सरकार के आपसी मंतव्य एवं गंतव्य के सिवाय मैं बीच में ‘अदा’ के प्रभाव की सार्थकता को नजरअंदाज नहीं कर सकता |
“”खुदा जब हुस्न देता है, नजाकत आ ही जाती है ” साढे सात से ज्यादह की जी डी पी ग्रोथ हो सकती है हमारी, वो भी तब, जब दुनिया की हालत खस्ता हो | तो एक दिलकश अदा, हमारी एक हैरतअंगेज़ शैली की बात तो बनती है | अलग अलग मुल्कों, इलाकों, भूभागों द्वारा घटनाओं, आपदाओं पर की गयी कार्रवाईयों से उनकी प्रतिबद्धताओं का पता लग जाता है | इस में टेलीविजन, सोशल मिडिया तथा अखबारों से भी मदद मिल जाती है| ये प्रतिबद्धताएं उनकी “अदा” है, शैली है | इसमें मशीनें है, पूंजी है, तकनीक है, आतंक है, आजादी है | ग्लोब के हिस्से विकसित है, विकासशील है, अविकसित है |
तुम्हारे साथ जो हुआ, जो हो रहा है, जो होगा, यह तुम्हारे जीवन की गुणवत्ता तय करता है | पर और के साथ तुमने जो किया, जो कर रहे हो, जो करोगे वह और के जीवन की गुणवत्ता तय करता है | मजेदार यह है कि कभी तुम ‘तुम’ हो , तो कभी तुम ‘और’ हो, जब दोनों दिशाओं से होना और करना समझ आ जाता है तो “समग्र जीवन” उसकी की गुणवत्ता, उसमें संभावनाएं भी समझ में आने लगती है | इस दृष्टि का वैश्विक सीमा तक विस्तार तय कर सकता है, क्या हो हमारी अदा, हमारी शैली |
भिन्न भूभागों के एक दूसरे से अलग चित्र हैं,इनकी अदाओं के स्केच कुछ ऐसे हैं:-
उस ओर समृद्धि, न्याय व् विश्व शान्ति के लिए तकनीक, पूंजी और आयुधों का संग्रह|
इस ओर समता व् समान भागीदारी के लिए तकनीक, पूंजी और आयुधों का संग्रह |
किसी छोर पर न्याय और शांति के लिए आसमानी कायदे और फरमान पर अमल के साथ तकनीक, पूंजी और आयुधों का संग्रह |
ये सारे चित्र सारे स्केच उनकी अपनी अपनी दिलकश और दिल फरेब “अदाओं” के काल-पत्र हैं जो इतिहास की जमीन में आने वाली पीढी की पहुँच तक की गहराई में दफनायें जायेंगें | लगभग इन सभी शैलियों में तकनीक, पूंजी और आयुधों का संग्रह एक कॉमन फेक्टर है|
भारत की ख़ास अदा,विशेष शैली, स्पेसिफिक स्टाइल को दुनिया के परदे पर उतारने के लिए हमारे पास दुर्लभ ‘कंटेंट’ है, करोड़ों युवा, उनका असंतोष , वैभव के लिए अनुरागी दृष्टि और उनके अपने बच्चों के लिए उनमें अपने से बेहतर भविष्य का सपना |
अब जब हम इस बेशकीमती सामग्री (कंटेंट) को रूपाकार (फॉर्म) देंना शुरू करते हैं तो दिक्कतों का सिलसिला चालू होता है | किशन और सुदामा एक जगह एक तरह की सीट पर एक ही स्कूल में पढ़कर पासआउट नहीं हो सकते | जितने किशन हैं उतनी मुरलियाँ नहीं हैं, जितने सुदामा हैं उतनी पोटलियाँ नहीं हैं | किशन तथाकथित मिडिल क्लास से है तो आज किशन है कल उसे सुदामा बनाने के लिए परिस्थितियां बेताब हैं |किशन और सुदामा को रेडी-हेल्प नहीं है, पर इतिहास के इस कालखंड में यह एक ऐसा मौका है जब क्या और कैसे किशन और सुदामा को एक साथ तय करना है |
तो अब काव्य में न रमें सो-काल्ड हवा में नहीं | पर हम ऐलान करते हैं कि बेबस जिस्मों की खरीद फरोख्त से , कैसीनों की कमाई से या आतंक के अर्दली बनकर जी डी पी बढाने से हमें ऐतराज है | बेशक दुनिया बाज़ार सी लगती हो पर बाजारू अदा की दरकार को हम खारिज करते हैं |

रूपं देहि जयं देहि यशो देहि व्दिषो जहि ||
(हे आदि चेतना , रूप दो, जय दो, यश दो, भीतरी शत्रुओं का नाश हो)

व्दिषो जहि – इस भीतरी शत्रुओं के नाश के वरदान में ‘भीतर’ केवल अपने अन्दर वाली बात नहीं है ,यह देश के अन्दर वाली भी बात है और जब दुनिया के अन्दर वाली बात से हम जोड़ेंगे तो भारत की अदा का जादू दुनिया के सर पर चढ़ कर बोलेगा |

तो अंदाज आएगा-ब्रोS,श्योर आएगा, अदा आयेगी-भाईजानSS बेशक आयेगी, मनोहर ढंग आएगा-अबे तेरी तोSSS क्यों नहीं आएगा,,,जब तू लाएगा तो बिलकुल आएगा |

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