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अदा

Posted On: 8 Jan, 2017 में

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अदा

मेहंदी लगाए बैठे हैं कुछ इस अदा से वो ,
मुट्ठी में उनकी दे दे कोई दिल निकाल के – रियाज़ खैराबादी

कोई और बैठेगा मेहंदी लगाकर तो माना जाएगा ज़नाब कि उसने फिलहाल काम से तौबा कर रक्खी है, पर इनके बैठने का दिलकश अंदाज निराला है | भई, इनके बैठने के अंदाज पर इस कदर भरोसा पैदा हो रहा है कि लगता है वो कुछ भी कर गुजरने के लिए बेपरवाह तैयार है | इसी मुकम्मल यकीन पर हम अपना दिल उनकी मुट्ठी में सौंपते हैं , जी हाँ , हम बेफ़िक्र हैं हमारे दिल की धड़कनें वहां महफूज रहेंगी |

ये यकीन बड़ी फौलादी चीज है | ये ऐतबार के लोहे से ढलता है | ढलने के पहले ये बहुत कुछ ताड़ता और टटोलता है | आगे कुछ कहूं , इसके पहले मोहब्बत का जिक्र जरूरी है | मोहब्बत साथ रहने की ख्वाहिश नहीं, किसी के तसव्वुर के बिना ना रहने की लगन है | ये मोहब्बत का जिक्र, यहाँ पूरी बात समझने में मदद करेगा | यकीन मौकापरस्त नहीं होता, मौकापरस्ती यकीन की जान ले लेती है | इसके ताडने- टटोलने का मरकज़ होता है- बन्दा और हालात | बन्दे की यकीन के लिए लायकी और काबलियत मतलब बन्दे की हालात के बाजू में खड़े रहने की वायदापरस्ती (कमिटमेंट) और और जब जरूरी हो तब हालात के खिलाफ मजबूत बगावती मिजाज, यूं कहिये कि अपनी बात पर टिके रहने की मजबूती | एक और बात है कि कशिश को नज़र अन्दाज़ कर के यकीन को समझना ना मुमकिन है | ये कशिश ही है जो रूह से यकीन के लिए दरवाजा खुलवाती है |
ये यकीन फौलादी होने साथ बहुत ख़ूबसूरत भी है | इसकी खूबसूरती इस बात में है कि यह एक ऐसा एहसास है जो बंटवारे के खिलाफ है, इसकी तासीर है जोड़ना | इसकी एक ख़ुफ़िया जानकारी और ये है कि रहता कहीं और है और इसे सांस के लिए हवा कहीं और से मिलती है | कम से कम दो वजूद जुड़ते है तभी दुनिया में यह आता है |

अब जैसा कि बिलकुल साफ़ है कि यकीन काफी चौंकन्ना रहता है, ऐतबार की लौ में तलाशी लेता है तब तक , जब तक कि एक काबिलेरूह नतीजा नहीं आता |

“अपनी बात पर टिके रहने की मजबूती” भांप कर कशिश और ऐतबार मिलकर यकीन बन जाते हैं |

कुल मिलाकर ये करामात अदा की ही होती है |

साहबान, ये दिलजोई बड़े संजीदा मसले के लिए है | देखिएगा, हालात और उनकी गवाही !
हम जब तालीम की मुहीम पर थे, तब मुल्क की ताजी ताजी आज़ादी के चर्चे थें | शहीदों की कुर्बानियों की मिसालें सुनकर हमलोगों में भी जोश का जज्बा था | जुर्म और जुल्म दोनों के लिए हिकारत थी | चीन का हमला हमारे बचपन को नहीं डरा पाया | घर और पडौस में कोई फासला हम बच्चों की समझ के बाहर था |उम्र में बड़े लोगों से डर लगता था, वो चाहे घर के मेम्बरान हो चाहे पडौस के ,दुआ सलाम तो बहुत जरूरी थी, चाहे उनकी नज़र हम पर हों या न हों | फिर नौकरी लगी , बुजुर्गों की जिम्मेदारियां उनके सरों से उतरकर हमारे कन्धों पर चढ़ गईं | मामूली दुआ सलाम के सिवाय लाल सलाम और प्रणाम की “मास अपील” को समझा | पाकिस्तान का हमला, इमरजेंसी का तजुर्बा, बंगला देश को आज़ादी मिलना, सोवियत संघ में “ग्लासनोस्त(खुली इकॉनमी)” की वजह से या “ग्लासनोस्त(खुली इकॉनमी)” के लिए अपना चोला छोड़ना, इन सबका हम पर, हम उम्र लोगों पर जबरदस्त असर हुआ | किसी मुल्क को बाकी दुनिया से रिश्ते की जरूरत की अहमियत हमारे अवाम को भी समझ में आ गयी |

पर बीसवी सदी के आखिरी सालों में अचानक एक सैलाब आया, कर्ज मिलना आसान हो गया, आमदनी बढ़ने लगी, रहन सहन आलीशान होने लगा, तालीम के रंगोरूप और रिवाज़ बदले | गैर बिरादरी, गैर मज़हबी, गैर मुल्की शादियों का चलन बढ़ा, बच्चें गैर मुल्कों में इज्ज़त के साथ न सिर्फ बसने लगे,वहां के वाशिंदे बन गए | ये सब कैसे हुआ, इसको हम उम्र-दराज लोग समझना नहीं चाहते, अड़चने साफ़ दिखाई देती हैं, जैसे बीते वक्त में पडी मुफलिसी की मार, कामचोरी को हक़ से जोड़ना, मज़हब के नुमायशी अंदाज़ से धौंस धमकी का माहौल बनाना, नई तकनीक से ताल नहीं मिलाना, जिंसों(कमोडिटीज) के हवाले हो कर उन्हीं को कोसना,कुल मिलाकर फेहरिस्त बड़ी लम्बी है | हकीकत में बूढों अधेड़ोँ की यह एक “कम्फर्ट ज़ोन” है,जहां से बाहर आना उतना ही दुश्वार है ,जितना भैंस का कीचड़ में से मर्जी से बाहर निकलना | चन्द बालों और चन्द दाँतों वाले लोग अपनी बिनाई दुरुस्त कर लें, आपकी पूरी नई-कौम अच्छे बुरे में तमीज के ठीक कगार पर डगमगा रही है, अपने पाँव जमाने के लिए वो किसी भी दिन इस तमीज से हाथ झाड सकती है, या फिर आपके साथ और ज्यादह सख्ती के लिए मजबूर हो सकती है | हिन्दुस्तान की अदा तय करने में ये बात अड़चन बनती है |

दूसरी तरफ हमारे मुल्क के हालात का ये जायजा इतिहास में कुछ इस तरह दर्ज हो रहा है “ 15 अगस्त 1947 को हिन्दुस्तान ब्रितानियों से आज़ाद हुआ | ठीक दूसरे विश्व युद्ध के बाद यह शीत युद्ध का वक्तेदौर है|धरती पर पूंजीवाद और समाजवाद के दो प्रयोग मानवीय विकास और कल्याण के लिए जारी हैं | दुनिया के सफल आज़ादी आन्दोलनों में हिन्दुस्तानी आन्दोलन इस तरह अलग है कि इसमें हथियारों का इस्तेमाल नहीं के बराबर हुआ, इसमें अवाम मारने की बजाय मरने के लिए तैयार था, दुनिया की दुविधा हमेशा बरकरार रहेगी कि इस आन्दोलन के नेता मोहनदास करमचंद गांधी को राजनीतिज्ञ दर्ज किया जाए या फ़कीर | स्थानीय अवाम उसे महात्मा (ग्रेट सोल) कहकर याद करती है |

(वक्त के पहिये के कुछ चक्करों के बाद )…..मिखाईल गार्बाचोव के नेतृत्व में पेरेस्त्रका(रिस्ट्रक्चरिंग) और ग्लासनोस्त(खुली इकॉनमी) के प्रयोग में सोवियत युनियन संघ भंग हुआ,और आदम जात पर “शीतयुद्ध” का मंडराता खतरा टल गया | हिन्दुस्तान में नियोजित अर्थ-व्यवस्था में राज्य के दखल पर नए चिंतन का आरम्भ ……..

(वक्त के पहिये के फिर कुछ चक्करों के बाद )…..दुनिया में शीतयुद्ध के बाद आतंकवाद का विस्तार मानवता पर बड़े खतरे के तौर पर चिन्हित ……टेरॅरिज्म में गुड टेरॅरिज्म बेड टेरॅरिज्म उसी जमीन पर स्कूल के किशोर बच्चे आतंकी हमले का निशाना,… दुनिया का पहला देश हिन्दुस्तान, मंगल ग्रह पर यान प्रक्षेपण में पहली कोशिश में कामयाब ….दिल्ली में ऑड इवन फार्मूला प्रदूषण नियंत्रण की दिशा में प्रयोगधर्मी कदम…. जीडीपी ग्रोथ के आधार पर हिन्दुस्तानी अर्थ व्यवस्था दुनिया की तेज रफ़्तार व्यवस्थाओं में सब से आगे …………….”

इस गुफ्तगूँ से जाहिर है कि एक मुल्क के तौर पर जो कमाई है, उससे बेशक सर उठकर ऊंचा हुआ है और खुद्दारी पर लगे जख्म ठीक होते लग रहे हैं | लेकिन बतौर वाशिन्दें अपनी गिरावट पर बजाय किसी अफसोस के एक फूहड़ बेहयाई की नुमाईश हमारी तासीर का हिस्सा बन गया है |
अभी 5 जून मतलब 2 दिन पहले की खबर है “स्वीटज़रलैंड में कायदा है कि किसी डिमांड कैम्पेन के तहत अगर एक लाख लोग दस्तखत कर देते हैं तो उस मुद्दे पर वोटिंग सरकार की लीगल जिम्मेदारी है |वहां ‘यूनिवर्सल बेसिक इनकम’ की मांग उठी, हरेक नागरिक (बच्चा या बड़ा) को कम्पलसरी तनख्वाह,चाहे वह कोई काम करें या नहीं करे | वोटिंग में 78% लोगों ने कहा- नहीं चाहिए मुफ्त का पैसा, काम के बदले ही तनख्वाह लेना मंजूर, हराम की कमाई मुल्क के लिए बुरी |” इस वाकये पर लुटने का दिल करता है |

मैं इस खबर में स्वीटजरलैंड की अदा की असरदार झलक का दीदार पाता हूँ | उस मुल्क की घड़ियां, बैंक और संविधान ऐसे ही दुनिया के दिमाग़ पर दस्तक नहीं देते |”भीनी खुशबू लगाए बैठे हैं, कुछ इस अदा से वो; मुट्ठी में उनकी दे रहे लोग दौलत निकाल के ”, माफ़ करना बात की संजीदगी डिस्टर्ब्ड हुई हो तो | ये इस मुल्क के सब्र और अंदरूनी ताक़त का नतीजा है |

मुझे मेरे मुल्क से बेपनाह मुहब्बत है, मैं ख़्वाबों में इसे बेइंतहा सब्र और बेशुमार ताक़त का मालिक निहारता हूँ | यहाँ सब्र और ताक़त के बहुत गैर मामूली और निराले मतलब हैं, जिस्मानी तो बिलकुल नहीं | हिन्दुस्तान की हिस्ट्री में सब्र और जुगराफिये में ताक़त है | यहाँ के हुकुमती खयालात में मुल्क की हदों को लेकर जबरदस्त सब्र है, यहाँ मुल्क के ख़याल पर वतन के ख़याल का पुरजोर असर है | मुल्क की हदें फैलाना यहाँ के हुकुमती खयालात का कभी भी मरकज़ नहीं रहा | सब्र की हदों से बाहर मुल्क बनाम वतन की हदें कभी नहीं रहीं | ताकत के मामले में भी हिन्दुस्तान सी मिसाल जमानों से किसी जमाने में नहीं मिलेगी | आर्य,अनार्य, हूण, कुशान,मंगोल,मुग़ल, ब्रितानी, फ्रांसीसी सब यहाँ की संगत में रच गए पच गए, बहुत ताक़तवर चक्की है यह मुल्क, बड़ा बारीक और हमवार पीसता है | हमारी आज़ादी की कामयाबी सब्र और ताकत का ताजा ताजा हैरतअंगेज अजूबा है |
हमारी सोच बहुत बड़ी है पर हमने आज़ादी के वक्त दुनिया से कमाया भरोसा गुमा दिया है | हमारे दिलों में एक दूसरे के लिए जगह बाकी नहीं बच रही | हमने दुनिया को एक सच्चाई से वाकिफ करवाया है कि अपना दिल खुद के रहने के लिए नहीं होता ये तो दूसरों की आरामगाह है | खुद के दिल पर तो सिर्फ जानवर ही कब्जा रखता है, आदमी का बसेरा तो दूसरे का दिल होता है यही आदमी होने का हक अदा करना है | हमने हमारे अपने पैग़ाम से ही मुंह मोड़ लिया है और संसार यह देख रहा है | हमारी बर्दाश्तगी(सहिष्णुता) शक के दायरे में आ गयी | अब कोई हमारी मुट्ठी में दिल दे तो क्यों !
हमारी तिजारत और सियासत के सिस्टम बुरी तरह बदशक्ल और बदसूरत हो गए हैं, कोई करें तो क्यों करे हिमाकत मुटठी में दिल देने की !
कुल मिलाकर अवाम के पास है इस तिलिस्म की चाबी, हम अपने आप में तबदीली लाते हैं, और ज़माना उसकी तस्दीक कर देता है तो मानिए हमारी अदा की कशिश यकीनन दुनिया का दिल हमारे हाथों में रखवाने में कामयाब होगी |

हमारी अदा की हिना में घर में सब्र, बर्दाश्तगी, ईमान, बेबस की फ़िक्र होनी चाहिए और बाहर खेमेबाजी से अलहदा अमन के लिए वादापरस्ती, खूंरंगेजी से फासला गर रहे तो हिना का रंग कभी नहीं उतरेगा, फिर हिन्दुस्तान की अदा से बचना मुश्किल ही नहीं नामुमकिन होगा-
मेहंदी लगाए बैठे हैं कुछ इस अदा से हम ,
मुट्ठी में दे रहे सब दिल निकाल के – (पूरे अदब से रियाज़ खैराबादी साहब से मुआफी चाहता हूँ )

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