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कागज़ के नोट कागज़ की अदालत

Posted On: 4 Dec, 2016 Hindi Sahitya में

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कागज़ के नोट कागज़ की अदालत में  कागज़ धर्म को मानने वाली सभी बिरादरियाँ जमा हो चुकी थी,कोलाहल अपने चरम पर था| इन लोगों में कागज़ के फूलों की बिरादरी को काफी एडवांस और मॉडर्न समझा जाता है, वैसे भी ये लोग बड़े ख़ूबसूरत होते हैं, खूब इनफ्लुएंस करते हैं और कोई गंध नहीं होती तो एक्सप्लोइट भी नहीं होते किसी से | इन्हीं में से एक उम्रदराज मोहतरमा आज की अदालत में जज है, अनेक ब्यूटी कॉन्टेस्ट में जज करने और जज होने का अच्छा ख़ासा तजुर्बा रखती हैं |  सरकारी वकील पोस्टर बिरादरी के हैं | ये साहब इश्तहार की तरह अजीमोशान पर्सनालिटी वाले शख्स हैं, इनकी कास्ट में कई घराने हैं, मसलन नोटिस, सम्मन, वारंट, पम्फलेट और फरमान आदि |   सरकारी कार्रवाई को रिकॉर्ड करेगी, रीडर वो दुबली पतली लड़की | दूर से या पीछे से देखने पर अननोटिसेबल साधारण सी, पर चेहरा आपकी नजर को इधर उधर नहीं होने देगा | मूर्ती की तरह सांचे में ढले, सुघड़ तराशे से नाक नक्श | बस सांवले कॉम्प्लेक्शन ने उसके रन्गोरूआब की तासीर को नजर लगा दी | यह ग्रन्थ बिरादरी की कन्या है, सुकाया | पत्रिका, पुस्तक, अखबार इस बिरादरी के ख़ास घराने हैं, जिनके वैभव पर इन दिनों काली छाया है | और ये हैं, आज के जमावड़े आज के मुकदमे के हीरो “सहस्त्र” | यह नोट बिरादरी का बाहुबली है | लोग इसे तिसुनिया भी कहते हैं, तीन छेदों वाला | नोट जाति के बारे में वैसे भी मान्यता है कि इनके दिल की जगह पर छेद होता है | यह तिसुनिया तो और भी विचित्र है, इसका मुँह नहीं मुहाना है | इसके मुँह से हवा एक अंधड़ तूफ़ान की तरह निकलती है, जिसमें सब उड़ जाता है, उजड़ जाता है | तीसरे छेद के बारे में अनाप शनाप अफवाह है, जिसमें से निकलता कुछ नहीं पर सब कुछ घुस जाता है | जैसे कारीगर कम्युनिटी में  लोहार, बढ़ई, अलग ब्लेकस्मिथ, कारपेंटर नामों से दुनिया में हर कहीं होते हैं, वैसे ही यह नोट कम्युनिटी में रूपया, रूबल, डॉलर, पौंड कई नामों से धरती पर मौजूद है |  गैलरी में कागज़ धर्म को मानने वाले समा नहीं रहे थे | कितने तो हैं,कागजी फूल, पोस्टर, ग्रन्थ, कागजी खिलौने, कैलेण्डर आदि वगैरह | कागज़ धर्मियों का महा कुम्भ | जज मोहतरमा ने जैसे ही हथौडा टेबल पर दो तीन बार ठोका, माहौल में शान्ति खुशबू की तरह फ़ैल गयी |  जज साहिबा – मुक़दमा शुरू किया जाए | सरकारी वकील – माय लेडी, इस मुकदमें में श्रीमान सहस्त्र उर्फ़ तिसुनिया पर पहला इल्जाम है कि इन्होनें अपनी हैसियत का बेजा फायदा उठाकर अपने से छोटे नोटों को दर दर का भिखारी बना दिया है | पांच, दस, बीस, पचास, सौ तो ठोकरें खा खा कर अधमरे हो गए हैं,अधमरे होकर भी उन्हें कहीं शरण नहीं मिलती | पांच सौ भी, जो इनकी चमचागिरी में हैं, वे बिस्तरों, टॉयलेटोँ, लॉकरोँ में कुछ दिनों का आराम भोगकर कॉस्मेटिक्स, शक्तिवर्धक दवाईयों, हवाई यात्राओं पर शहीद हो जाते हैं | मिस्टर सहस्त्र आप सफाई में क्या कहेंगें ? सहस्त्र – ग्लेमरस पोस्टर जी, आखिर फंसा ही लिया ! सरकारी वकील – कैसे ? सहस्त्र – तिसुनिया को सिर्फ आदेश देने की आदत है, सफाई में कहना यानि दिमाग पर जोर डालना है| खैर, सुनिए “खुदा जब हुस्न देता है, नजाकत आ ही जाती है ” वैसे ही “जिस्म में बेपनाह ताक़त हो, हिमाक़त हो ही जाती है ”, इज दैट क्लियर ? ये सुनकर सुकाया के तीखे नाक नक्श तमतमाहट से कुछ और धारदार हो गए पर सवाल जवाब को फुर्ती से रिकॉर्ड कर लिया | जज साहिबा ने नाक की नोक से चश्मे को पीछे खिसकाया फिर अपनी नज़र से तिसुनिया को नापने लगी | ऑडियँस ने कसमसाकर दायें बाएं एक दूसरे को परखा फिर अगले सवाल की फरमाईश कर दी | सरकारी वकील साहब ने टाई की गाँठ को नीचे सरकाकर गले को थोडा आज़ाद किया, अगले इल्जाम का ऐलान किया | -    नाम शोहरत लूटने के बाद इन्होनें गायब होने की स्कीम बनाई है ताकि ये बेख़ौफ़ हो कर अपनी शान को उलट कर नशा बना लें |  सहस्त्र – वकील साहब, केंचुली उतारना गायब होना नहीं कहलाता | केंचुली उतरने से ताक़त का चुस्ती से इस्तेमाल होता है और खूबसूरती निखर जाती है सो अलग | देखो भई, हम बड़े आराम में पले हैं, रहे हैं | सियासती पार्टीज के ठीये, दहशतगर्दों के दौलतगाह, हवाला कारोबारियों के सेंटर, नेपाल, मॉरिशस, पाकिस्तान के आरामगाह, प्लेन और शिप्स की महफूज़ पेटियां ये सब हमारे ऐशोआराम के ठिकाने रहे हैं | सेहत खूब फल फूल गयी है, 1000 वाले कपडे टाईट हो गए तो 2000 का नाप देकर नई पोशाकें सिल गई हैं | राज की बात तो यह है कि 5000 और 10000 के साईज के भी कॉस्ट्यूम तैयार हैं | तो हम अपनी नई दोहजारा सजधज के साथ रेसलिंग रिंग में हाज़िर हैं, कहीं गायब वायब नहीं हुए हैं, बरखुरदार |  कागज़ की अदालत में सुई पटक सन्नाटा | अचानक जयकारों नारों का शोर कागज़ की अदालत में घुस आया | “मुद्रा महिमा की ! जय,” “कॉइन करेंसी ! जिंदाबाद”,”जब तक सूरज चाँद रहेगा ! सिक्का तेरा नाम रहेगा ”| न्याय का हथौडा फिर टकटकाया तो इन टकों की टीम चुप हुई |  जज साहिबा ने फरमाया – अगर आज के मुकदमे से जुडी बात हो तो अपने लीडर को आगे कीजिये वर्ना कोर्ट की कार्रवाई में बाधा पहुंचाने के लिए सजा का प्रावधान है | एक महाजनी भाव भंगिमा वाले सज्जन सिक्कों की जमात से आगे निकल कर आये और सर झुकाकर पूछा – इजाजत है ?  जज साहिबा – इजाजत है | महाजन – न्यायाधीश महोदया, मैं हजारीचंद हूँ | तंजावूर मंदिर के एक हजार साल पूरे होने की स्मृति में सन 2010 में रिज़र्व बैंक ने मुझे जारी किया था, सब समझ गए होंगें-1000 का  | हम गिनती में कम है इसलिए चलन में नहीं हैं | पर मुझे मिलाकर सारे सिक्के जो चलन में हैं या चलन से बाहर सबका कैरेक्टर एक जैसा है | बड़ा मजबूत और टिकाऊ | भेष हमारे भी अनेक रहे हैं, कभी ताम्बे के, कभी लोहे के, कभी चांदी के कभी सोने के , हम चमड़े के भी रहे हैं पर कैरेक्टर कभी ढीला नहीं रहा | इक्की दुप्पी हो या चवन्नी अठन्नी, रुपैया हो दस रुपैया, अरे डेढ़ सौ का कलदार क्यों न हो, जो गुरुदेव टैगोर की याद में सन 2011 में निकला, चाहे कोई भी हो, आपस में कभी भेदभाव नहीं,कोई उंच नीच नहीं | अपना इस्तेमाल करने वालों की पूरी खिदमत की है | जैसे ईमानदार मैरिज ब्यूरो जोडियाँ मिलाता है वैसे हमने अपने धारक की जरूरतों की जोडीदार जरूरतों से पूरी शिद्दत से मिलवाया है | इस तिसुनिया ने मुद्रा की महिमा को कलंकित किया है |  सरकारी वकील – किस तरह ?  हजारीचंद – यहाँ सभी छोटे नोट अपना फ़र्ज़ निभाते रहें वहां सहस्त्र और तिसुनिया ने ज़ेब से बेवफाई कर के तिजोरी से आशनाई कर ली | आदमी की जरूरत की बजाय उसके लालच की खिदमत करने लगे |सहस्त्र और तिसुनिया ने अपनी “सुपीरियरीटी” की बिजली बाकी नोटों पर इस तरह गिराई कि वे खुद अपनी नज़र में गिर गये |हे, न्याय की देवी, दूसरों की निग़ाह में गिरने की बजाय अपनी निग़ाह में गिरना, इससे बड़ा नर्क दुनिया में हो नहीं सकता | इस तिसुनिया और इसके चमचे पांच सौ ने मनुष्य की अँगुलियों की सुख दुःख की छाप को अपने माथे का तिलक नहीं समझा, हाथ का मैल माना, आदमी के हाथ का मैल | इस तरह पूरी करेंसी आदमी के हाथ का मैल हो गई |समूची “मुद्रा” जमात का अपमान |  तभी डीजे की जोरदार आवाज वाली धुन पर हिपहॉप डॉन्स करती पोनीटेल बांधे चिथड़ा कॉस्ट्यूम में एक स्लिम ट्रिम शख्सियत अदालत में दाखिल हुई, जनाना या मर्दाना अंदाज़ लगाना मुश्किल !! “रैप-सॉन्ग” गाती – “योर ऑनर योर ऑनर  इन दोनों का एक टेम्पर  इन दोनों का एक जोनर  एक थैली के चट्ठे बट्ठे  एक उल्लू के दोनों पट्ठे  दोनों उचक उचक कर चढते काले धन का टॉवर योर ऑनर योर ऑनर” सरकारी वकील पोस्टर भाई तथा रीडर सुकाया ने अचकचाकर जज साहिबा को ताका |  जज साहिबा ने आँखों से दिलासा दिया,और फरमाया- -    जो भी कहना है कठघरे में आकर कहिये |       “योर ऑनर, सिक्कें और नोट ,चाहे जमीन में गड़े रहे हों,या तिजोरी में पड़े रहें हों, इन्होनें जरूरत पर काम आने का दोस्ताना रोल नहीं निभाया,अपने कर्तव्य “अ फ्रेंड इन नीड इज अ फ्रेंड इन डीड” से ब्लफ किया है | मुद्रा का दिल पारदर्शी होता है, इन्हें साफ़ सुथरे कांच की तरह होना चाहिए था, जिसके आरपार सब क्लियर दिखता रहे | कम से कम आईना बन जाते तो जो इनका किया इन्हें खुद दिखता रहता | वैसे मैं प्लास्टिक कॉर्ड हूँ, मेरी जमाखोरी नहीं हो सकती | दर्शक दीर्घा में कागज़ धर्म को मानने वाली सभी बिरादरियां चीख चीख कर पूछने लगी, क्या कालाधन मिट जाएगा, भ्रष्टाचार हट जाएगा ? प्लास्टिक कॉर्ड बोला – पता नहीं, पर मैं मुद्रा का नया अवतार हूँ, मेरा हर एक्शन रिकॉर्ड होता है, मेरे कारण मुद्रा यानी करेंसी पर कोई कलंक नहीं लग सकता | मुझसे गुपचुप कुछ नहीं होता मैं डंके की चोट पर इतिहास बनाता हूँ | पोस्टर भाई और सुकन्या डायस पर जज के पास पहुंचकर खुसुरपुसुर करने लगे | जज साहिबा बोली – यह कागज़ धर्म को मानने वालों की अदालत है | प्लास्टिक कॉर्ड – क्या है कागज़ धर्म ? कागज़ का धर्म है, जो होता है उसे जस का तस रिकॉर्ड करना | इतिहास बनाना | सन्दर्भ सुरक्षित रखना | मैं वो ही तो करता हूँ, फुल प्रूफ | सारा माहौल फुसफुसाहट का समंदर बन गया | जज साहिबा के ऑर्डर ऑर्डर और ठक ठक की जुगलबंदी ने अदालत को साइलेंट ज़ोन में बदल दिया | जज साहिबा – प्लास्टिक कॉर्ड की कथनी और करनी में प्रथम-दृष्टया प्राईमा-फेसी कोई शक शुबहे की गुंजाईश नहीं दिखती इसलिए इनको कागज़ धर्म का अनुयायी बनाम  कागज़ धर्म का बन्दा करार दिया जाता है | उम्मीद है कि इनका रचा इतिहास अमन का फलसफा कायम करेगा | सहस्त्र और हजारी चंद जैसों को जो आज चलन के बाहर तो हैं पर सुरक्षा की दृष्टि से इन्हें तडीपार काला पानी की सजा मुक़र्रर की जाती है | कोर्ट की भीड़ बंटी हुई सी है- “काला धन भ्रष्टाचार ख़त्म नहीं होंगें” | “पता तो लगता रहेगा यार |””करतूत छिपी तो नहीं रहेगी”| इस बात का लेखक सिर्फ ये सोचता है – “जो कौम इतिहास से सबक लेती है, वह ज़िंदा रहती है ”|

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